भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175. (धारा 156 (3) दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन अभियुक्त को सुनने की बांछनीयता |
यद्यपि अभियुक्त को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175. (धारा 156(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता) के उपबंधाधीन सुनना आवश्यक नहीं है पर यदि अभियुक्त को मजिस्ट्रेट ने सुन लिया है तब इसमें कुछ गलत नहीं है।'
1. आपराधिक उपबंध की संवैधानिक वैधता एक कानूनी अनिवार्यता है |
भारतीय न्यायिक एवम् आपराधिक व्यवस्था की एक मूल विशिष्टता यह है कि यह पूर्णतः संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप होनी चाहिए। संवैधानिक वैधता भारतीय न्याय परिदान प्रणाली (जस्टिस डिलीवरी सिस्टम) की एक अनिवार्य कानूनी पूर्व शर्त है। कोई न्यायालय कितना भी बड़ा क्यों न हो उसे ऐसी कोई अधिकारिता नहीं है कि वह संविधान द्वारा अनाधिकृत आदेश पारित कर सके।प्रसिद्ध विधिवेत्ता केलसन के विधि शास्त्र के सिद्धांत (प्योर थियोरी आफ लों) के अनुसार प्रत्येक देश की कानूनी प्रणाली में कानूनों का एक श्रेणीबद्ध वर्गीकरण (हायरकी) होता है और जब एक उच्चतर कानून तथा निम्नतर कानून में संघर्ष है तब उच्चतर कानून अभिभावी अथवा प्रभावी होगा।
हमारे संविधान में कानूनों की श्रेणीबद्धता निम्नवत है
1 भारत का संविधान
2 संसद अथवा राज्य विधान मण्डल से अधिनियमित कानून
3. प्रदत्त (डेलीगेटिड) अथवा अधीनस्थ विधान उदाहरणार्थ किसी कानून, अथवा विनियमों के अधीन बनाए गए नियम आदि
4. सरकारी ओदश, प्रशासकीय तथा कार्यपालक निर्देश
भारतीय दण्ड संहिता तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता उक्त श्रेणीबद्धता अथवा वर्गीकरण में द्वितीय सतह में आती है अतः भारतीय दण्ड संहिता अथवा दण्ड प्रक्रिया संहिता के किसी उपबंध से संविधान के किसी प्रावाधान का अतिलघन होता है तब ऐसे उपबंध को या तो असंवैधानिक घोषित किया जाएगा या इसका निर्वाचन इस प्रकार किया जाएगा कि इस उपबंध को संवैधानिक उपबंधों में से संगत तथा अनुरूप किया जा सके।' भारत में कानून का राज्य है। यहां कानून शक्तिशाली राजा से भी ऊपर है। इसी कारण हमारी विधिक व्यवस्था में कमजोर से कमजोर व्यक्ति, यदि विधि उसके पक्ष में है, ताकतवर से भी ताकतवर व्यक्ति को पराजित कर देता है। कोई भी कानून के समक्ष भिखारी नहीं है।
भारत में सविधान के अनुच्छेद 21 के संदर्भ में परिभाषित तथा निर्वचित अभिव्यक्ति
विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया या विधि की सम्यक प्रक्रिया को मान्यता प्रदान की गयी है।'
संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन अथवा वैयक्तिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के सिवाय वंचित नहीं किया जा सकता है।
मेनका गाँधी बनाम भारत संघ के निर्णय से पूर्व जीवन तथा वैयक्तिक स्वतन्त्रता के विरूद्ध सरंक्षण केवल विधि विरुद्ध आदेशों के विरूद्ध था (ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य), किन्तु वर्तमान में अभिव्यक्ति विधि द्वारा स्थापित सम्यक प्रक्रिया के सिवाय के आवरण में विधिक तथा न्यायिक आदेश भी आते है। स्वीकृत न्यायिक निर्वचन के अनुसार इस अभिव्यक्ति से अभिप्रेत है कि जिस प्रक्रिया को चुनौती दी गई है वह युक्तियुक्त ऋजु (फेयर) निष्पक्ष तथा न्यायसंगत है।' किसी भी मूल अधिकार अथवा प्राकृतिक न्याय के विपरीत पारित आदेश एक अकृतता मात्र है।
भारतीय न्यायिक व्यवस्था तथा आपराधिक प्रणाली संविधान के अनुच्छेद 14. (विधि के समक्ष समानता), 19 (भाषण की स्वतन्त्रता आदि अधिकारों के विरूद्ध संरक्षण), 20 (अपराधों के लिए दोषासिद्धि के सम्बंध में संरक्षण), 21 (जीवन तथा वैयक्तिक स्वतन्त्रता का सरंक्षण) तथा 22 (कतिपय मामलों में गिरफ्तारी तथा निरोध के विरूद्ध संरक्षण) के उपवन्धों से नियन्त्रित है। इन अनुच्छेदों के परमादेशों (मैनडेट) के अनुसार न्यायिक आदेशों का उक्त संवैधानिक प्रावाधानो के अनुरूप होना विधिक रूप से आवश्यक है। अभिव्यक्ति "विधि की सम्यक प्रक्रिया में उपरोक्त प्रयुक्त शब्द फेयर के अधीन प्राकृतिक न्याय का सिद्धान्त भी आता है। यह सिद्धान्त संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है। इसी आशय के विचार से मानव अधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा में व्यक्त किए गए है। कारण या "तर्क युक्त आदेश पारित करना एक न्यायिक आवश्यकता है। कारण न देना न्याय प्रदान करने से इंकारी है। आदेश का स्पीकिंग होना एक न्यायिक आवश्यकता है।
2. भारतीय दाण्डिक विधि पूर्णतः पंथ निरपेक्ष (सैकुलर) है |
माननीय तेरह न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ निर्णय एस. आर. बोमानी वनाम भारत संघ 23 के मतानुसार अब यह सुस्पष्ट किया जा चुका है कि पंथ निरपेक्षता (सैकुलैरिज्म) भारतीय सविंधान का आधारभूत ढाँचा है। चूंकि जैसा कि इसी अध्याय को संक्षिप्त रूप में स्पष्ट किया गया है कि भारतीय विधिक व्यवस्था में संविधान विधिक श्रेणीवद्धता क्रम (Hierchy) में प्रथम सतह की विधि है अतः प्रत्येक दाण्डिक उपबंध पंथनिरपेक्ष स्वरूप का होना चाहिए।" भारतीय दण्ड सहिता,' तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता, के उपबंध पंथनिरपेक्ष माने गए है।
3. भारतीय आपराधिक विधि में न्यायपालिका तथा कार्यपालिका की अधिकारिता को पृथक पृष्थक रखा गया है |
दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की वसर्वाधिक विशिष्ट विशेषता यह है कि इसके द्वारा आपराधिक विधि में न्यायपालिका तथा कार्यपालिका की अधिकारिता को पूर्णत पृथक कर दिया गया है। अब उक्त संहिता के लागू होने के बाद पीनल अपराधों के विचारण से लेकर अपील अथवा रिवीजन सम्बंधी कृत्य उच्च न्यायालय की सीधी अधीनस्थता में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों को प्रदान किए गए हैं। कार्यपालक मजिस्ट्रेट मात्र नाममात्र के मजिस्ट्रेट हैं। उन्हें अब केवल लाइसेन्स आदि देने तथा शांति बनाये रखने सम्बंधी कार्य ही दिए गए हैं। वह वर्तमान आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी अपराध का विचारण नहीं कर सकते हैं। उन्हें दण्ड तथा जुर्माना आदि अधिरोपित करने से भी मुक्त रखा गया है। वह ऐसा कोई कार्य नहीं कर सकते है जिसमें साक्ष्य की समीक्षा की आवश्यकता हो (देखिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 3. (धारा 3 दण्ड प्रक्रिया संहिता) इसके अतिरिक्त जो थोड़ा बहुत न्यायिक कार्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 126, 135, 152, 164. (धारा 107/116, 133 तथा धारा 145) के सम्बंध में करते भी है, उनकी वैधता को परखने के लिए रिवीजन सम्बंधी शक्तियाँ सेशन न्यायालय को दी गई हैं जो उच्च न्यायालय के अधीन है।
4. भारतीय विधि में विधि की अनभिज्ञता किसी प्रतिरक्षा का आधार नहीं|
भारतीय आपराधिक न्याय प्रशासन के अधीन यह सुस्थापित तथा अविवादित कानूनी स्थिति रही है कि विधि की अनभिज्ञता आपराधिक अपराध से आरोपित तथा अभियोजित होने पर किसी भी व्यक्ति के लिए प्रतिरक्षा का आधार नहीं है।'
प्रसिद्ध लेटिन कहावत के अनुसार विधि में तथ्य की जानकारी न होना (ignorantia facti nonexcusat) आरोप की प्रतिरक्षा का आधार हो सकता है किन्तु विधि की जानकारी न होना आरोप से प्रतिरक्षा का आधार नहीं है।
उक्त अभिव्यक्ति विधि की अनभिज्ञता प्रतिरक्षा का आधार नहीं से अभिप्रेत है कि भारत में आवासित प्रत्येक नागरिक तथा विदेशी (जब वह भारत में है) भारत की विधि से जानकारी रखता है, ऐसी कानूनी उपधारणा है।
इस विधिक स्थिति पर भी विवाद नहीं है कि आपराधिक तथा दाण्डिक विधि की क्षेत्राधिकारिता तथा प्रवर्तन सदैव स्थानीय होता है। यदि कोई विदेशी अस्थायी तौर पर भी भारत आता है तब भी उसके सम्बंध में उपधारणा है कि वह भारतीय आपराधिक विधि से परिचित है। अतः ऐसा विदेशी नागरिक यह प्ली लेने के लिए सक्षम नहीं है कि जिस आरोप से उसे आरोपित किया गया है. वह उसके अपने देश में दण्डनीय अपराध नहीं है। इसी कारण विधिक निर्णयों के अनुसार फ्रांस के एक नागरिक की इंग्लैण्ड में यह प्ली स्वीकार नहीं की गयी कि उसे यह जानकारी नहीं थी कि फ्रांस के विपरीत इंग्लैण्ड में एक मैत्रीपूर्ण लड़ाई (Dual) में प्रतिद्वंदी को हमले से चोट पहुंचाना दण्डनीय अपराध है।' इसी तरह एक ईरानी का भारत भ्रमण पर (धारा 377 भारतीय दण्ड संहिता) के आरोप के उत्तर में यह तर्क स्वीकार नहीं किया गया कि किसी बालक के साथ मैथुन उसके देश में अपराध नहीं है।
इस क्रम में यह भी कथित किया जाता है कि जब एक विदेशी नागरिक जिस पर विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम 1947 की धारा 8 (1) तथा धारा 23 (1-क) का कि वह उक्त धाराओं का अतिलंघन करके सोना लाया था तब उसके इस निवेदन को स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि उसे उक्त विधि की जानकारी नहीं थी तथा वह समझता था कि वह एक किलो सोना अपने सामान के साथ ला सकता है।'
यह प्ली दण्ड में कमी का आधार एक विदेशी अभियुक्त के लिए हो सकती है। इस अभिव्यक्ति विधि की अनभिज्ञता क्षम्य नहीं है. को विधिक रूप से स्वीकार करने के लिए तर्क यह है कि प्रत्येक नागरिक से अपने देश के कानून और अस्थायी रूप से आवासित विदेशी से यह आशा तथा अपेक्षा है कि यह सम्बद्ध देश के कानूनों की जानकारी प्राप्त करेगा तथा रखेगा। इसके अतिरिक्त उक्त उपधारणा के अभाव में प्रत्येक आरोपी को केवल इस प्रतिरक्षा की प्ली को छोड़कर किसी अन्य प्ली लेने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी और देश में विधिक प्रशासन को संचालित तथा बनाए रखना सम्भव नहीं होगा।
सार के रूप में प्रतिपादित किया जा सकता है कि विधिक बिन्दु पर मूल (औमिशन) सिविल अथवा आपराधिक किसी भी मामले में प्रतिरक्षा का आधार नहीं है।
विधि का मूल क्षम्य नहीं है के निम्न अपवाद है
(1) यह कि आरोपी व्यक्ति विधि सक्ष्म (सुई जुरिस) नहीं है वह 7 वर्ष से कम का है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 20, 21. (देखिए धारा (82 तथा 83 भारतीय दण्ड सहिता)
(2) आरोपित व्यक्ति अपनी चित्त विकृत्तता के कारण विद्यमान विधि की जानकारी रखने में असमर्थ है भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 22. (धारा 84 भारतीय दण्ड सहिता)
यहाँ यह टिप्पणी करना आवश्यक है कि उक्त विधिक उपधारणा केवल राष्ट्रीय विधि के सम्बंध में है. अर्न्तराष्ट्रीय विधि के विषय में नहीं है। यहां यह भी उल्लेख करना उचित है कि शब्द राष्ट्रीय विधि के अधीन संसद तथा राज्य की विधायिका द्वारा अधिनियमित संहिता तथा किसी अधिनियम में अधिनियमित कानून ही आते हैं। कार्यपालिका द्वारा पारित तथा जारी आदेश, अधिसूचना तथा उपविधि नहीं आते हैं।
यदि किसी व्यक्ति का चालान एक निश्चित सीमा के ब्लैड के चाकू रखने के लिए किया जाता है तब यह आवश्यक है कि ऐसे ब्लैड युक्त चाकू रखने को अपराध घोषित करने वाले नोटीफिकेशन का उल्लेख अभियुक्त की धारा 25 शस्त्र अधिनियम के आरोप में उल्लेखित किया जाए। बिना उक्त नोटीफिकेशन के उल्लेख के अभियुक्त पर आरोपित आरोप विधि विरूद्ध होगा।' किन्तु लालजी बनाम उ. प्र राज्यों में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का मत है कि यदि आरोप में सम्बंधित अधिसूचना का उल्लेख नहीं है परन्तु अभियोजन ने सुसंगत अधिसूचना को रिवीजनकी स्टेज पर भी दाखिल कर दिया है तब यह कानून का पर्याप्त अनुपालन है।
यदि सुसंगत दाखिल की गयी अधिसूचना चाकू के कब्जे को दण्डनीय घोषित करती है तब इस के आधार पर 'किरपान' को विधि विरूद्ध रखने के लिए धारा 25 आयुध अधिनियम के अधीन दण्डित नहीं किया जा सकता है। दोनों वस्तुओं में विभेद है जिसे सरलता से देखा जा सकता है।
इसी प्रकार धारा 7 आवश्यक वस्तु अधिनियम् 1955 के आरोप में स्पष्ट यह उल्लेख करे कि इस अधिनियम की धारा 3 के अधीन घोषित किस कन्ट्रोल आर्डर का अतिलघंन अभियुक्त ने किया है।
जारी की गयी अधिसूचनाओं का न्यायालय न्यायिक नोटिस ले सकता है और इनको सिद्ध कराने की अवश्यकता नहीं है।'
नोटः- कृपया भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 14, 15. (धारा 76 व 77 भारतीय दण्ड सहिता) का अवलोकन करें।
अब यह प्रश्न उठता है कि विधिक स्थिति क्या होगी जब यह मूल तथ्य तथा विधि की मिश्रित भूल है। इस सम्बंध में यह सुस्थापित विधि है कि विधि तथा तथ्य की यह मिश्रित मूल, आरोपित आरोप की प्रतिरक्षा की प्ली हो सकती है।"
बम्बई उच्च न्यायालय के अनुसार यह उपधारणा की विधि की मूल क्षम्य नहीं है, भारतीय दण्ड संहिता के अपराधों के साथ-साथ स्थानीय तथा विशेष अधिनियमों के अपराधों पर भी लागू होगी।"
परन्तु मद्रास उच्च न्यायालय के अनुसार उक्त उपधारणा विशेष अथवा स्थानीय अधिनियमों के उपबन्धों पर लागू नहीं होगी।
5. निर्दोषता की उपधारणा :
निर्दोषता की उपधारणा एक मानव अधिकार है। इस तथ्य को अन्र्तराष्ट्रीय रूप से कानूनी मान्यता मिल चुकी है। भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली एवम् प्रशासन का एक मूल कानूनी आधार यह है कि आरोपित अभियुक्त निर्दोष है। उसके विरूद्ध दोषी होने की उपधारणा नहीं है। इसके विपरीत अभियुका निर्दोष है। यह कानूनी उपधारणा उसके पक्ष में विचारण आरम्भ होने से लेकर अन्तिम न्यायालय से सुनवाई तक जारी रहती है। यदि अभियुक्त विचारण न्यायालय से दोषी सिद्ध भी हो जाता है तब भी उसके पक्ष में निर्दोषता की उपधारणा जारी रहती है। ऐसी उपधारणा का मानक (स्टैन्डर्ड) कम नहीं होता है ज्यों का त्यों बना रहता है। अभियुक्त द्वारा अपराधकारिता करने की सम्भावनायें कितनी भी अधिक क्यों न हो और सन्देह कितना भी घोर क्यों न हो. यह दोषिता का रूप नहीं ले सकता है। अभियोजन को अपने आरोप को अपराध के प्रत्येक संघटक के साथ सन्देह की प्रत्येक छाया से परे सिद्ध करना होगा।अभियुक्त उस समय तक निर्दोष माना जाता है जब तक निर्दोषता की उपधारणा का खण्डन नहीं हो जाता है।'
अभियुक्त के पक्ष में निर्दोषता के सम्बन्ध में यहां यह टिप्पणी करना आवश्यक है कि बर्तमान विधान प्रक्रिया (legislation) में कुछ अपराधों के कारित होने की कानूनी उपधारणा अधिनियमित की गयी है। दूसरे शब्दों में कुछ अपराधों के कारित होने की कानूनी उपधारणा है। उदाहरणार्थ भारतीय न्याय सहिता 2023 की धारा 80, (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304 ख) में दहेज मृत्यु की उपधारणा विधान मन्डल द्वारा की गयी है। किन्तु इस उपधारणा का लाभ अभियोजन पक्ष तभी उठा पाएगा जब वह उक्त प्रश्नगत उपधारणा बनाने के लिए ऐसे अपराध के मुख्य संघटकों को साधारण अपराधों की तरह स्थापित न कर दे। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 80. (धारा 304 ख भारतीय दण्ड संहिता) में अपेक्षित उपधारणा तभी बनायी जा सकती है जब अभियोजन निम्न तथ्य स्थापित करने में सफल हो जाता है कि
(1) स्त्री की मृत्यु किसी ज्वलनशीलता (वर्न) या शारीरिक चोट द्वारा की गयी है, या
(2) स्त्री की मृत्यु विवाह के सात वर्ष के भीतर असामान्य परिस्थितियों में हुई है. और
(3) यह दर्शित हो जाता है कि ऐसी स्त्री की मृत्यु के कुछ पूर्व उसके पति ने या उसके पति के नातेदार ने दहेज की किसी मांग के लिए या उसके सम्बंध में उसके साथ क्रूरता की थी या उसे तंग किया था।
जब तक अभियोजक अपराध के उक्त संघटक स्थापित करने में सफल नहीं होता तब तक उसे दहेज हत्या की उपधारणा का लाभ नहीं मिलेगा।
वर्तमान में यह विधायी चलन विकसित हो रहा है कि कुछ अपराधों में विशेषकर विशेष अधिनियमों में दण्डनीय अपराधों में किसी वस्तु का मात्र कब्जे में पाया जाना दण्डनीय अपराध घोषित किया जाता है। दृष्टांत स्वरूप आर्म्स एक्ट की धारा 25 में बिना लाइसैन्सी किसी हथियार की बरामदगी ही दण्डनीय है। यही स्थिति एन डी. पी. एस. एक्ट, खाद्य अपभिश्रण निवारण अधिनियम 1954 है, विदेशी मुद्रा विनियम अधिनियम तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम के कुछ विशिष्ट उपबंधो की है जिसमें किसी प्रतिषिद्ध वस्तु वस्तु की बरामदगी, चाहे यह वस्तु चरस है, हीरोइन है, गांजा है, मिलावटी तेल है या मिलावटी सिमेन्ट कानूनी अपराध माना गया है ऐसे अधिनियमों में मात्र कब्जा प्रदर्शित करने मात्र से अभियुक्त को दडित नहीं किया जा सकेगा। उसे दोष सिद्ध करने के लिए यह कानूनी अनिवार्यता है कि अभियोजक विश्वसनीय साक्ष्य से उक्त वस्तुओं की वरामदगी को स्वतन्त्र साक्ष्य से स्थापित करें। अभियोजन यह नहीं कह सकेगा कि एक बार कब्जे के आरोप से आरोपित होने पर अभियुक्त यह स्वयं स्पष्ट करे कि उक्त वस्तु पर उसका कब्जा किस प्रकार हुआ है।' बस इतनी छूट है कि उपरोक्त अपराध आपराधिक स्थिति (मैन्सरिया), को अपराध का संघटक स्वीकार नहीं करते है। अभियोजन से मात्र कब्जा सिद्ध करने की अपेक्षा आपराधिक दोषी मानसिक स्थिति को स्थापित करने की आवश्यकता नहीं है। इस स्थिति की तो विधिक उपधारणा है, यदि? कब्जे का तथ्य सिद्ध हो जाता है।
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