
धारा 167(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता में निर्दिष्ट 90 या 60 दिन की गिनती की प्रक्रिया-
भारतीय नागरिक सुरक्षा सहिता, 2023 की धारा 167. (चारा 167(2) दण्ड प्रक्रियश संहिता) नब्बे अथवा साठ दिन की अवधि का गणना मजिस्ट्रेट द्वारा रिमान्ड के दिनांक से होगी, न कि ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी के दिनांक से।'
दाण्डिक विचारण में न्यायालय को दो तरह की अधिकारिता है:
आपराधिक न्यायालय को अपराधों के सम्बंध में दो तरह की अधिकारिता है। यह कि
(1) किन्ही या किसी विशिष्ट प्रकार के अपराधों की सुनवाई की अधिकारिता,
(2) किन्ही या किसी अपराध को सुनने की क्षेत्रीय अधिकारिता,
पूर्वतर प्रकार की अधिकारिता मामले की जड़ तक जाती है तथा इसके अतिलंघन से सम्पूर्ण विचारण शून्य (वायड) हो जाता है जबकि पश्चातवर्ती अधिकारिता निर्णीत या अलघनीय (Peremptory) स्वरूप की नहीं है और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 501, (घारा 462 दण्ड प्रक्रिया सहिता) के अधीन ठीक किए जाने योग्य है। क्षेत्रीय अधिकारिता को बस सुविधा की दृष्टि से किसी विशिष्ट न्यायालय में उपलब्ध कार्यभार के प्रशासकीय दृष्टिकोण के सन्दर्भ में विहित किया गया है। ऐसा करने में अभियुक्त तथा गवाहों की सुविधा का भी ध्यान रखा गया है।'
शब्द 'अधिकारिता से अभिप्राय प्रारिम्भक अधिकारिता से है।
जब आरम्भ में ही क्षेत्रीय अधिकारिता के बारे में आपत्ति निम्न न्यायालय में उठा दी गयी है तब यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 501. (घारा 462. दण्ड प्रक्रिया संहिता) लागू नहीं होती।"
धारा में प्रयुक्त शब्द अन्य कार्यवाही के अन्तर्गत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144, (धारा 125, दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन चल रही भरण-पोषण की कार्यवाही भी आती है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 501, 511, (घारा 462 तथा धारा 465. दण्ड प्रक्रिया संहिता) को एक साथ पढ़ने से स्पष्टतः दर्शित होगा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की यह योजना है कि जहा अधिकारिता का अभाव, चाहे वह क्षेत्रीय अधिकारिता का हो या प्रक्रिया की किसी अन्य अनियमितता के आधार पर हो, तब भी सक्षम न्यायालय द्वारा पारित कोई भी आदेश अथवा दण्डादेश उस समय तक अपास्त नहीं किया जाएगा जब तक कि अभियुक्त की ओर से यह कहा न जाए और सिद्ध न हो जाए कि अधिकारिता के उक्त अभाव से न्याय निष्फल हुआ है। यदि कोई विचारण गलत स्थान पर भी विचारित हो गया है और वह स्थान ऐसा है जिसके ऊपर विचारित करने वाले न्यायालय को कोई क्षेत्रीय अधिकारिता प्राप्त नहीं है तब भी अभियुक्त का विचारण उस समय तक अभिखंडित नहीं किया जाएगा जब तक कि न्याय की निष्फलता की प्ली नहीं ली जाती है और न्याय की निष्फलता सिद्ध नहीं हो जाती है।'
यह धारा केवल गलत स्थानों पर की गई कार्यवाहियों के बारे में है. और केवल अधिकारिता सम्बन्धी उन्हीं दोषों को ठीक करती है जो न्यायालयों की स्थानीय अधिकारिता के बारे में हैं।
अतः जब वाणिज्य चिन्ह अधिनियम (मर्चेन्डाइज मार्क्स ऐक्ट) की धारा 6 के अपराध का विचारण उस स्थान पर नहीं हुआ, जहाँ यह अपराध किया गया था. तब यह अभिनिर्धारित हुआ कि यह दोष धारा 462 के अधीन ठीक होने योग्य गलती है।
इसी प्रकार यदि भरण-पोषण के लिए आवेदन को अपने राज्य से बाहर ही दाखिल किया है तब भी यह धारा लागू होगी।'
यह धारा स्थानीय अधिकारिता के दोष को छोड़कर, अधिकारिता के किसी अन्य दोष पर लागू नहीं होती।
अतः जब किसी सेशन न्यायालय से अनन्यतः विचारणीय मामले का विचारण मजिस्ट्रेट करता है तब यह धारा लागू नहीं होगी तथा किया गया सम्पूर्ण विचारण अवैध एवं दूषित हो जाएगा।
इस धारा के अधीन स्थानीय अधिकारिता के प्रत्येक दोष को संरक्षण प्राप्त नहीं है। यह धारा उस मजिस्ट्रेट की कार्यवाही पर लागू नहीं होगी, जिसे विचारण करने से पहले यह जानकारी थी कि उसे ऐसी स्थानीय अधिकारिता नहीं है। यह धारा स्वयं में मजिस्ट्रेट को अधिकारिता प्रदान नहीं करती।"
स्थानीय अधिकारिता की अनियमितता भी सद्भावपूर्वक किये जाने पर ही माफ होगी, जानबूझ कर ऐसा करना गलत भावना वाला कार्य है।'
जब विचारण के शुरू होने से पहले ही न्यायालय का ध्यान इस ओर आकर्षित कर दिया गया है कि न्यायालय को स्थानीय अधिकारिता नहीं है. तब इस आपत्ति को अनदेखी करके धारा 462 का सहारा नहीं लिया जा सकता।'
इस उपबन्ध का प्रयोग केवल अपील या पुनरीक्षण न्यायालय ही कर सकते हैं. विधारण न्यायालय नहीं, यह धारा तब लागू होती है जब विचारण न्यायालय कोई निष्कर्ष आदेश अथवा दण्डादेश पारित कर चुका है।'
जब किसी मजिस्ट्रेट के सामने क्षेत्रीय अधिकारिता के बारे में आपत्ति की जाती है तथ यह देखना मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि उसे मामले में क्षेत्रीय अधिकारिता है या नहीं। वह चारा 462 का सहारा लेकर अधिकारिता ग्रहण नहीं कर सकता।'
किन्तु ऐसी स्थिति में जब गलत क्षेत्रीय अधिकारिता के बारे में मजिस्ट्रेट के समक्ष आपत्ति उठायी गयी है तब मजिस्ट्रेट को भारतीय नागरिक सुरक्षा सहिता, 2023 की धारा 207. (धारा 187. दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन मामले को सक्षम क्षेत्रीय अधिकारिता वाले न्यायालय को अन्तरित कर देना चाहिए तथा यदि मजिस्ट्रेट ने ऐसा नहीं किया है और मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 528. (धारा 482) के अधीन कार्यवाही अभिखण्डन के लिए याचिका दी गयी है तब उच्च न्यायालय को यह अधिकारिता है कि मामले की कार्यवाही को अभिखण्डित करने के स्थान पर मामले को सक्षम न्यायालय को भेज दें।"
जब मजिस्ट्रेट ने गलत तरीके से आपत्ति को रद्द कर दिया है तब यह धारा लागू नहीं होगी।'
लेकिन जब सद्भावपूर्वक उस आपत्ति पर विचार करके उसे मजिस्ट्रेट के द्वारा रह किया गया है तब इस धारा का लाभ मिल जाएगा।"
मजिस्ट्रेट अधिकारिता के प्रश्न को तय कर सकता है। तय करने में मजिस्ट्रेट गलती से यदि धारा 462 का हवाला दे भी देता है. तब इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता।'
यदि किसी न्यायालय को षडयन्त्र के अपराध की सुनवाई की अधिकारिता है तो वह उक्त षड्यन्त्र के दौरान किए गए कृत्यों से गठित अपराध की भी सुनवाई कर सकता है चाहे ये अपराध उसकी अधिकारिता से बाहर कारित किए गए हैं।
न्यायालय, जिनके द्वारा अपराध विचारणीय है:
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 21, (धारा 26 दण्ड प्रक्रिया संहिता) में विहित किया गया है कि किस न्यायालय को किस अपराध के सुनने की अधिकारिता है। धारा 26 निम्नवत है. इस संहिता के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए-
(क) भारतीय दण्ड संहिता के अधीन किसी अपराध का विचारण-
(1) उच्च न्यायालय द्वारा किया जा सकता है, या
(2) सेशन न्यायालय द्वारा किया जा सकता है, या
(3) किसी अन्य ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जिसके द्वारा उसका विचारणीय होना प्रथम अनुसूची में दर्शित किया गया है.
(ख) किसी अन्य विधि के अधीन किसी अपराध का विचारण, जब उस विधि में इस निमित कोई न्यायालय उल्लिखित है, तब उस न्यायालय द्वारा किया जाएगा और जब कोई न्यायालय इस प्रकार उल्लिखित नहीं है तब-
(1) उच्च न्यायालय द्वारा किया जा सकता है. या
(2) किसी अन्य ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है. जिसके द्वारा उसका विचारणीय होना प्रथम अनुसूची में दर्शित किया गया है।
राज्य संशेधन
(उत्तर प्रदेश)
दण्ड प्रक्रिया संहिता (उत्तर प्रदेश संशोधन) अधिनियम, 1983 (उत्तर प्रदेश) अधिनियम संख्या 1 सन् 1984 की धारा 6 के द्वारा मूल धारा 26 में खण्ड (ख) के स्थान पर निम्नलिखित खण्ड रख दिया जाएगा, अर्थात्-
(ग) किसी अन्य विधि कि अधीन किसी अपराध का विचारण-
(1) जब उस विधि में इस निमित कोई न्यायालय उल्लिखित है. तब उस न्यायालय द्वारा, या ऐसे न्यायालय से पंक्ति में वरिष्ठ किसी न्यायालय द्वारा किया जा सकता है, और
(2) जब कोई न्यायालय इस प्रकार उल्लिखित नहीं है. तब ऐसे न्यायालय द्वारा जिसके द्वारा उसका विचारणीय होना प्रथम अनुसूची में दर्शित किया गया है. या ऐसे न्यायालय से पक्ति में वरिष्ठ किसी न्यायालय द्वारा किया जा सकता है।
अधिकारिता के सम्बन्ध में कुछ सामान्य मार्गदर्शक सिद्धान्त निम्नवत है।
प्रत्येक दण्ड न्यायालय की किसी विशिष्ट अपराध को विचारित करने की अधिकारिता न्यायालय को गठित करने वाले अधिनियम अथवा अपराध को परिनिश्चित करने वाले अधिनियम से प्राप्त होती है।'
कानून द्वारा प्रदत्त न की गई अधिकारिता का न्यायालय द्वारा स्वयं ग्रहण करना अथवा कानून द्वारा प्रदत्त अधिकारिता का न्यायालय द्वारा प्रयोग न करना अभियुक्त के कानूनी अथवा सवैधानिक अधिकारों का हनन है।
अधिकारिता का प्रश्न किसी मजिस्टेट द्वारा धाराओं की संख्या में परिवर्तन करके तय नहीं किया जा सकता क्योंकि धाराओं की संख्या तो लेबिल मात्र है। वस्तुत तथ्यों अभिकधनों का अवलोकन किया जाना है।'
अधिकारिता कानून तथा तथ्य का मिश्रित प्रश्न है। इसका विनिश्चय परिवाद अभिलिखित अभिकथनों के आधार पर न होकर उन तथ्यों के आधार पर होता है जो अन्तत सत्य पाए जाते हैं
सहित में कोई ऐसा उपबन्ध नहीं है जो निम्नतर न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध कर उच्चतर न्यायालय द्वारा सज्ञान लेना वर्जित करता है।' इसी सिद्धान्त के आधार पर धारा 28 की दोनों उपधाराओं में यह उपबन्ध अक्षुग्ण रखा गया है कि यद्यपि अपराधों के विचारण है न्यायालय को दर्शित करने वाली संहिता की प्रथम अनुसूची में न्यायालय का नाम निर्दिष्ट । जो साधारणतः इन अपराधों का विचारण करेंगे, किन्तु विशेष परिस्थितियों में, इस संहिता है अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए उच्च न्यायालय अथवा सेशन न्यायालय इन अपराधों का विचारण कर सकते हैं।
इसी आधार पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 362, (धारा 323. दण्ड प्रक्रिया संहिता) 1973 में यह उपबन्धित है कि यदि किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष अपराध को किसी जाँच या विचारण में निर्णय पर हस्ताक्षर करने से पूर्व कार्यवाही की किसी स्टेज पर उसे यह प्रतीत होता है कि मामला ऐसा है जिसका विचारण सेशन न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए (यद्यपि प्रथम अनुसूची के कालम 6 में यह अपराध मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय दर्शित है), तो वह उसे इस धारा से पूर्व अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन उस न्यायालय को सुपुर्द कर देगा तथा सुपुर्दगी पर ऐसे सेशन न्यायालय को इस मामले को विचारण करने की अधिकारिता होगी। किन्तु यदि अपराध भारतीय दण्ड संहिता से भिन्न किसी अन्य विधि के अन्तर्गत आता है और वह विधि के विचारण के लिए किसी विशिष्ट फोरम को निर्दिष्ट करती है, तब इस निर्दिष्ट फोरस को मामले को सेशन सुपुर्द करने की अधिकारिता नहीं है। धारा 9. अफीम अधिनियम के अपराध का विचारण मजिस्ट्रेट के द्वारा ही होना चाहिए। सेशन न्यायाधीश को ऐसे अपराध के सम्बन्ध में कोई अधिकारिता नहीं है और मजिस्ट्रेट ऐसे अपराध को सेशन सुपुर्द करने के लिए भी सशक्त नहीं है।
भारतीय दण्ड संहिता के अधीन सभी अपराधों का विचारण इस संहिता के अन्य उपबन्धी के अधीन रहते हुए उच्च न्यायालय, सेशन न्यायालय अथवा प्रथम अनुसूची में कालम सख्या 6 में दर्शित न्यायालय द्वारा किया जा सकता है।
इसी प्रकार अन्य विधि के अधीन किसी अपराध का विचारण इस संहिता के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए उस विधि में विनिर्दिष्ट न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है. किन्तु यदि ऐसी विशेष विधि में ऐसा कोई न्यायालय विनिर्दिष्ट नहीं है. तो मामले का विधारण उच्च न्यायालय या प्रथम अनुसूची में दर्शित न्यायालय द्वारा ही होगा।'
धारा 209 मामले को सेशन न्यायालय को सुपुर्दगी की व्यवस्था करती है, किन्तु ऐसी व्यवस्था उच्च न्यायालय के विषय में नहीं है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि उच्च न्यायालय को विचारण की मूल अधिकारिता नहीं है और इस धारा द्वारा उच्च न्यायालय को प्रदत्त अधिकारिता उक्त न्यायालय की असाधारण दण्ड अधिकारिता तक परिसीमित है। उच्च न्यायालय को धारा 407 की उपधारा (1) (iv) के अधीन किसी विशिष्ट मामले को निचले न्यायालय से स्वयं अपनी फाइल पर अन्तरित करके विचारण की अधिकारिता है।
इस संहिता द्वारा या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के द्वारा अभिव्यक्त रूप से जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, कोई सेशन न्यायालय आरम्भिक अधिकारिता वाले न्यायालय के रूप में किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं करेगा जब तक मामला इस संहिता के अधीन उसके सुपुर्द नहीं कर दिया गया है (देखिये धारा 193)।
धारा 345 व 349 के अधीन न्यायालय की दृष्टिगोचरता या उपस्थिति में किया गया न्यायालय की अवमानना का अपराध इसके अपवाद है।
"संहिता के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए अभिव्यक्ति से तात्पर्य इस संहिता के अन्य उपबन्धों के रहते हुए अभिव्यक्ति से यह अभिप्रेत है कि यह धारा यथा संहिता की प्रथम अनुसूची संहिता के अन्य उपबन्धों से नियन्त्रित होती है। इस प्रकार सुपुर्दगी की अपेक्षा करने वाली धारा 193 धारा 26 को नियन्त्रिण करती है. क्योंकि इस धारा में यह विहित है कि सेशन न्यायालय किसी अपराध का सीधा संज्ञान नहीं ले सकता। इसी प्रकार धारा 407(1)(1) उच्च न्यायालय की मूल अधिकारिता के बारे में।
धारा 26 को नियन्त्रित करती है। धारा 26 (ख) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति इस संहिता के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए का निर्वचन करते हुए उच्चतम न्यायालय ने साबिर अली' में अभिनिर्धारित किया है कि यह शब्द अवश्य पालनीय है। इनसे बचा नहीं जा सकता है। वे कहते हैं कि इस संहिता के अधीन उपबन्धों के अधीन रहते हुए किसी अन्य विधि के अधीन किसी अपराध का विचारण, उस न्यायालय द्वारा किया जाएगा जब ऐसा न्यायालय उस विधि में उल्लिखित है।
इस प्रकार उत्तर प्रदेश बन अधिनियम, 1949 के अधीन मामलों का विचारण उस अधिनियम की धारा 15 (2) में उल्लिखित न्यायालय से होगा। इसी प्रकार की स्थिति सेना अधिनियम, 1950, नौसेना अधिनियम 1957, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947, उत्तर प्रदेश पंचायत राज्य अधिनियम, 1947, पुलिस अधिनियम और मुसलमान वक्फ अधिनियम के बारे में है।
इसी प्रकार साधारण दण्ड न्यायालयों की संज्ञान लेने की अधिकारिता भी इस अभिव्यक्ति से नियंत्रित है। धाराएँ 190, 191, 195, 196, 197 व 198 के उपबन्धों के अनुपालन के बाद ही सम्बन्धित अधिकारिता वाले न्यायालय इन धाराओं में उल्लिखित अपराधों का संज्ञान ले सकते हैं।
यदि अनेक अपराधों में एक भी सेशन न्यायालय में विचारणीय है, तब सम्पूर्ण मामला सेशन सुपुर्द किया जाएगा।"
उत्तर प्रदेश प्राइवेट वन अधिनियम, 1948 की धारा 15 (1) के अपराध का विचारण मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी को नहीं है। ऐसे मजिस्ट्रेट द्वारा विचारण शून्य (वायड) है जैसा कि धारा 46 (ठ) उ. प्र. स. में वर्णित है।'
अधिकारिता का प्रश्न पहली बार उच्चतम न्यायालय में नहीं उठाया जा सकता है।
यह उचित होगा कि क्षेत्राधिकारिता का प्रश्न मजिस्ट्रेट, उठाए जाने पर पहले तय करे।
नियम यह है कि आमतौर पर परिवादी को क्षेत्राधिकारिता वाले न्यायालय को चुनने का अधिकार है। अभियुक्त यह निवेदन नहीं कर सकता है कि इसका विचारण किसी विशिष्ट न्यायालय से हो किन्तु इतना सब होते हुए भी न्यायालय यह देखेगा कि किसी को तंगी या परेशानी का सामना न करना पड़े। इस दृष्टि से भी न्यायालय क्षेत्राधिकारिता सम्बन्धी प्रश्न को देखेगा।
अधिकारिता के बिन्दु पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 4. (धारा 4 दण्ड प्रक्रिया संहिता) एक महत्वपूर्ण कानूनी परमादेश (मैनडेट) विहित करती है। इस धारा 4 का सार है कि भारतीय दण्ड सहिता के अपराधों की अधिकारिता दण्ड प्रक्रिया संहिता के उपबन्धों में उल्लिखित उपबंधों के अनुसार की जाएगी। इसी प्रकार यदि किसी विशेष या स्थानीय अधिनियम के प्रावाधानों में अधिकारिता सम्बधी कोई विशिष्ट प्रावाधान है तब ऐसे अधिनियमों में दण्डनीय अपराधों की अधिकारिता का प्रश्न उक्त विशिष्ट प्रावाधान से प्रशासित अथवा मार्गदर्शित होगा किन्तु यदि उक्त विशेष अथवा स्थानीय अधिनियम् में अधिकारिता सम्बन्धी कोई विशिष्ट प्रावाधान नहीं है तब ऐसी स्थिति में दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधिकारिता सम्बन्धी प्रावाधान लागू होंगे।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 4. (धारा 4 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन आपराधिक न्यायालय की अधिकारिता व्यापक है तथा निष्काषक (एक्सहौस्टिव) है।'
दृष्टात स्वरूप आवश्यक वस्तु अधिनियम, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम तथा एन. डी. पी. एस. एक्ट में विशेष न्यायाधीश द्वारा सुनवाई की व्यवस्था है और इसी तरह खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम में धारा 16 के अधीन सरकार द्वारा अधिकृत विशिष्टतः न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा सक्षिप्ततः सुनवाई की व्यवस्था है तब उक्त अधिनियमों में दण्डनीय अपराधों का विचारण केवल इन अधिनियमों में अधिकृत न्यायालय ही कर सकते हैं। दण्ड प्रक्रिया संहिता में अधिकृत साधारण न्यायालय नहीं।
किन्तु गौवध अधिनियम में विशेष अधिनियम होते हुए भी सुनवाई की अधिकारिता सम्बन्धी कोई विशिष्ट उपबन्ध नहीं है अतः इस अधिनियम के अधीन अपराधों की सुनवाई साधारण न्यायालय ही करेंगे।
'सहमति से अधिकारिता का प्रश्न तय नहीं किया जा सकता है।'
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 507, (घारा 461 दण्ड प्रक्रिया सहिता) अधिकारिता के सम्बन्ध में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसके खण्ड (ठ) के अनुसार यदि कोई मजिस्ट्रेट विधि द्वारा इस निमित अधिनियमित नियमों के अधीन किसी अपराधी के विचारण के लिए अधिकृत नहीं है तब ऐसे न्यायालय द्वारा किया गया विचारण सम्पूर्ण कार्यवाही को दूषित कर देगा दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय XIII में दण्ड न्यायालयों की जाँच तथा विचारण सम्बन्धी अधिकारिता सम्बन्धी प्रावाधान धाराएं 177 से 189 के रूप दिए गए हैं। उनका अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है।