
भारतीय दण्ड एवम् न्यायिक व्यवस्था में पुलिस की अन्वेषण शक्ति तथा अधिकारिता तथा न्यायालय की न्यायिक शक्ति तथा अधिकारिता को पृथक करना है:
भारतीय दण्ड एवम न्यायिक व्यवस्था की एक मुख्य विशेषता यह है कि इसमें न्यायालय की न्यायिक अधिकारिता तथा पुलिस की अपराध को अन्वेषित करने की अधिकारिता में ने केवल विभेद रखा गया है बल्कि उन्हें एक दूसरे से पृथक भी रखा गया है।
वर्ष 1945 में प्रिवी काउन्सिल द्वारा निर्णीत विधि निर्णय तथा प्रस्तुत टीका की प्रस्तुत संक्षिप्त रूपरेखा की विधिक समीक्षा लेखबद्ध करने तक यह निश्चित, स्थिर तथा निरन्तर विधिक स्थिति रही है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35, 173, 175, 176, 193, (दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 41, 154, 156, 157 तथा 173) का सार है और यह बिन्दु सर्वाधिक महत्व का है कि न्यायपालिका को पुलिस के उन मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जो उनकी अधिकारिता की विषय वस्तु है और जिसके सम्बन्ध में विधि ने उन पर जाँच करने का कर्तव्य अधिरोपित किया है। इसके अशुभ परिणाम होंगे: यदि पुलिस के इन अधिकारों में उच्च न्यायालय द्वारा अपनी अन्र्त्तनिहित अधिकारिता के अधीन हस्तक्षेप किया जाता है। न्यायापालिका तथा पुलिस के कृत्य (फंक्शन) एक दूसरे के पूरक हैं। वह एक-दूसरे के व्यापी (ओवर लैपिंग) नहीं है। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का विधि तथा व्यवस्था के सम्यक अनुपालन से मेल केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है जब पुलिस तथा न्यायपालिका को अपने अपने कृत्य का प्रयोग करने के लिए स्वतन्त्र छोड़ दिया जाए। न्यायपालिका का कृत्य तब आरम्भ होता है जब उसके समक्ष आरोप प्रस्तुत कर दिया गया है। इससे पूर्व नहीं।
इसी तरह के विचार माननीय उच्चतम् न्यायालय ने अभिनन्दन झ बनाम दिनेश मिश्रा, में व्यक्त करते हुए अभि निर्धारित किया है कि किसी भी हस्तक्षेपीय अपराध के अन्वेषण का क्षेत्र अनन्यतः अन्वेषण शाखा के अधीन तथा अधिपत्य का है जिसके ऊपर न्यायालय कोई नियंत्रण नहीं रख सकते है और उन्हे अन्वेषण की स्टेज पर अन्वेषण की कार्यवाही को उस समय तक दबाया तथा टरकाया नहीं जाएगा जब तक अन्वेषण, सम्बन्धी प्रावाधानों के अनुरूप चल रहा है।
माननीय उच्चतम न्यायालय में विधि निर्णय बिहार राज्य बनाम जे. ए. सी. सलदाना' में पुलिस अधिकारी की किसी अपराध को अन्वेषित करने की शक्तियों की चर्चा करते हुए स्पष्ट किया है कि अपराध को खोजने या पता लगाने तथा उसके दण्ड के क्षेत्र में एक पूर्णतः स्पष्ट तथा सुचिन्हित प्रावाधान है। किसी अपराध का अन्वेषण पुलिस के माध्यम से कार्यपालिका का क्षेत्र है जिसकी अधीक्षणता (सुपरीटैन्डेन्स) राज्य सरकार में निहित है। जब पुलिस अपराध का अन्वेषण करती है और यह पाती है कि कोई अपराध कारित हुआ है तब उसका कर्तव्य उसे सिद्ध करने के लिए साक्ष्य एकत्रित करने हैं और जैसे ही यह सब पूर्ण हो जाता है अन्वेषण अधिकारी न्यायालय को इस निवेदन के साथ अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करता है कि वह अभियुक्त के विरूद्ध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिताः 2023 की धारा 210, (धारा 190 दण्ड प्रक्रिया संहिता) (1) (ख) के अधीन अपराध की संज्ञान ले। इसी के साथ पुलिस का कर्तव्य समाप्त हो जाता है।
इस बिन्दु पर कमोवेश इसी तरह के कानूनी विचार उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल' एम. सी. अब्राहम तथा महाराष्ट्र राज्य तथा अदरीधरन दास बनाम बंगाल राज्य तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक पूर्ण न्यायापीठ ने अजीत सिंह बनाम उ. प्र. राज्य में व्यक्त करते हुए सार के रूप में अन्वेषण, जिसके अधीन अभियुक्त की गिरफ्तारी भी होती है में हस्तक्षेप करने के सम्बन्ध में उच्च न्यायालय की सीमां अन्वेषण को अभिखण्डित करने तथा अभियुक्त की गिरफ्तारी को स्टे करने के सम्बन्ध में निम्नवत विचार व्यक्त किए है:
यह विधिक स्थिति अब स्पष्ट है और सुस्थापित है कि न्यायपालिका तथा पुलिस की अधिकारिता का क्षेत्र परस्पर अलग अलग है। यह एक दूसरे के परिपूरक तो है पर परस्पर न एक दूसरे की विरोधी प्रवृति के है और न ओवरलैपिंग ही है। आमतौर पर अन्वेषण (जिसका गिरफ्तारी एक भाग है)। कार्यपालिका (पुलिस) के अन्नयत अधीन है और इसकी न्यायिक सवीक्षा बहुत ही सीमित रूप से अपवादी मामलों में ही की जा सकती है। दृष्टांत स्वरूप ये अपवादी मामले हैं
1. जब पुलिस अधिकारी किसी अपराध का अन्वेषण करते समय अपने कानून द्वारा परिसीमित सीमाओं का अतिलघन करती है तथा अपनी अन्वेषण सम्बन्धी शक्तियों का अनुचित प्रयोग करके दुरूपयोग करते हुए आरोपित व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और उसकी सम्पति के सम्बन्ध में हननकारी कार्य करती है तब ऐसी स्थिति में न्यायपालिका नागरिको को पुलिस के रहमोकरम् पर नहीं छोड़ेगी और मामले व तथ्यों के सन्दर्भ में उचित उपचार (रिलीफ) उपलब्ध कराएगी।
2. पुलिस को अपनी गिरफ्तारी की विवेकी शक्ति का प्रयोग सावधानी तथा अपनी सीमाओं में रहकर करना होगा।
3. जब पुलिस अहस्तक्षेपीय या असंज्ञेय मामलों में बिना अधिकारिता के पहले मामले का अन्वेषण करती है और फिर विधि विरुद्ध गिरफ्तारी करती है।
4. न्यायालय केवल बिरले से बिरलेतम् मामले में ही अन्वेषण में जिसमें गिरफ्तारी भी शामिल है हस्तक्षेप कर सकती है।
5. न्यायालय का यह कर्त्तव्य है कि वह व्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा कार्यपालिका के अपराध को अन्वेषण करने की शक्ति में सन्तुलन बनाये रखे तथा यह देखे कि क्या प्रश्नगत अन्वेषण, विधिनुसार किया जा रहा है तथा जब वह यह देखता है कि यह अभियुक्त को तंग व परेशान करने के निमित्त किया जा रहा है, तब न्यायालय ऐसे अन्वेषण में सदैवतः हस्तक्षेप कर सकता है। पुलिस तथा न्यायालय की अधिकारिता के सम्बन्ध में कुछ मोट-मोटे कानूनी पहलु निम्नवत है।
1. संज्ञेय अथवा हस्तक्षेपीय अपराधों को अन्वेषण करने, उनके अन्वेषण करने की प्रक्रिया तय करने और उनके सम्बन्ध में अन्तिम राय बनाने की अधिकारिता केवल पुलिस की है। न्यायालय उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।
2 न्यायालय को यह अधिकारिता नहीं है कि वह अन्वेषण अधिकारी को फाइनल रिपोर्ट के स्थान पर आरोप पत्र प्रस्तुत करने का आदेश दे सके।' मजिस्ट्रेट ने जब एक बार अपनी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175, (धारा 156 (3) दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन शक्ति का प्रयोग किया है तथा परिवादी के आवेदन को थाने को अन्वेषण के लिए भेजा है तब वह ऐसे आदेश पर पुनः विचार नहीं कर सकता है चाहे उसके समक्ष पक्षकारों ने राजीनामा ही क्यों न दाखिल कर दिया है क्योंकि पुलिस को हस्तक्षेपीय मामलों में अन्वेषण की अनियन्त्रित शक्ति है।
3. न्यायालय को पूर्ण अधिकारिता है कि वह पुलिस की फाइनल रिपोर्ट को अस्वीकृत करके अग्रिम अन्वेषण का आदेश दे सके।
4. न्यायालय को पूर्ण कानूनी अधिकारिता है वह पुलिस अधिकारी द्वारा दाखिल फाइनल रिपोर्ट को अस्वीकृत कर दे तथा धारा 190 (1) (क) अथवा (ख) के अधीन अपराध का संज्ञान ले सके।'
5. न्यायालय को पूर्ण अधिकारिता है कि वह अन्वेषण अधिकारी द्वारा चालान न किए गए अतिरिक्त अभियुक्तों का भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 358. (धारा 319 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के उपबंधाधीन विचारण कर सके।
6. न्यायालय कानूनी रूप से सक्षम है कि वह अभियुक्त का विचारण उन अपराधों के लिए भी कर सके जिनका उल्लेख अन्वेषण अधिकारी ने अपने आरोप पत्र में नहीं किया है।"
7. दौरान अन्वेषण मजिस्ट्रेट किसी अभियुक्त को अपना हस्तलेख का नमूना देने के लिए निर्देश नहीं दे सकता है किन्तु ऐसा वह इस दौरान विचारण कर सकता है और वह अभियुक्त को उसके पैरों व अंगुष्ठ चिन्ह लेने के निर्देश दे सकता है।
8. न्यायालय अन्वेषण की स्टेज पर केवल अपवादी परिस्थितियों में ही हस्तक्षेप कर सकता है अन्यथा नहीं