अभिव्यक्ति "फौजदारी की वकालत" से अभिप्रेत तथा इसका महत्व : आम बोलचाल की कानूनी भाषा में 'वकालत निम्न चार प्रकार की जानी जाती है।
1. फौजदारी।
2. दीवानी।
3. माल अथवा राजस्व ।
4. अन्य वकालत जैसे आयकर, बिक्री कर, श्रम, उपभोक्ता फोरम तथा ट्रिब्यूनल आदि की वकालत। शब्द "फौजदारी" से अभिप्रेत मारपीट से नहीं है। यह एक फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है दांडिक (पीनल) अथवा आपराधिक (क्रिमनल या कलपेबिल) फौजदारी अथवा आपराधिक विधि ऐसे कार्यों अथवा भूल की गुणवत्तता को इंगित करती है जिन्हें राज्य की अधिकारिता से सम्यक पीनल उपबंधों के अधीन निषेध किया गया है। सरल शब्दों में आपराधिक विधि न्यायशास्त्र की वह शाखा है जो राज्य की सुरक्षा तथा व्यवस्था के विरूद्ध पारित अपराधों की चर्चा करती है और उनसे समाज की सुरक्षा उपलब्ध कराती है | वकालत भी फारसी शब्द है जिसका अर्थ है. पैरवी करना या प्लोड करना वकालत के अधीन सफाई तथा अभियोजन पक्ष दोनों की ओर से पैरवी करना आता है। वकालत एक गौरवमयी सेवाभाव युक्त मानवीय पेशा है। (देखिए उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज्य लॉ आफिसर्स संघ) अधिवक्ता न्यायिक प्रणाली अथवा तत्र के मुख्य पत्रों में से एक है। वास्तव में यह इस तंत्र का विस्तार मात्र है। अधिवक्ता न्यायालय का अधिकारी है। वह विशेषज्ञ है। न्यायलय की सत्य की खोज में सहायता करता है। न्यायिक वन की सफलता बहुधा विधिक पेशे द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं पर निर्भर है। प्रसिद्ध न्याय एवम् विधि विद एफ. ली. बैले का कथन है कि अपराध से आरोपित व्यक्तियों की पैरवी करना एक फौजदारी अधिवक्ता का अत्याधिक अरुचिपूर्ण अथवा बेस्यादी कार्य है। कुशल अधिवक्ताओं की समाज में अनिवार्यता तथा उपयोगिता को स्वीकार करते हुए प्रसिद्ध विद्वान श्री चारलेस डीक्न्स की टिप्पणी सही प्रतीत होती है कि जब तक समाज में बुरे व्यक्ति रहेंगे, अच्छे अधिवक्ताओं की आवश्यकता बनी रहेगी। यदि अभियुक्त का अधिवक्ता हाजिर नहीं है तब उसकी गैरहाजिरी में न्यायलय विक्लांगता की स्थिति में आ जाते हैं। जब न्यायालयों को दोनों पक्षकारों के अधिवक्ताओं की सहायता मिलती है तब इसका फल वादकारियों को एक पूर्ण एवम अधिक विचारपूर्ण निर्णय के रूप में मिलता है।
3. अभियुक्त का ऋजु तथा निष्पक्ष विचारण का अधिकार:-
अन्वेषण के लिए औपचारिक गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है। अन्वेषण के लिए कंवल इतना पर्याप्त है कि अभियुक्त अन्वेषण एजेन्सी की प्रभावी अभिरक्षा में था। यदि कोई न्यायाधीश किसी बाद हेतुक का विचारण करता है तब उसमें इतनी श्रमता साहस तथा न्यायिक निष्पक्षता होनी चाहिए कि वह अपने समक्ष नामाले की वस्तुनिष्ठता ऋजुता तथा निष्पक्षता से निपटा सके। कोई भी व्यक्ति न्यायिक हैसीयत में कार्य नहीं कर पाएगा यदि उसका पूर्ण आचरण यह विश्वास करने का आधार प्रदान करता है कि वह इस मामले का निस्तारण खुले मस्तिष्क अथवा निष्पक्षता से नहीं कर पाएगा। उन्यायालय के आदेशानुसार सुनवाई करने वाले न्यायाधीश की न केवल ऋजुता से सुनवाई करनी चाहिए बल्कि उसका न्यायिक कृत्य अऋजुता तथा द्वेष के संदेश से ऊपर होना चाहिए ।
जहाँ एक और हमारी आपराधिक न्याय व्यवस्था ऋजु विचारण तथा अभियुक्त दोष सिद्ध होने से पूर्व निर्दोष स्वीकार करने हेतु सुरक्षा कवच विहित करती है वहीं दूसरी ओर यह भी परिकल्पित करती है कि आपराधिक विचारण सभी अभियुक्त तथा समाज के प्रति न्याय करने हेतु तात्पर्यिंत है और यह अभियोजन को अपना केस सिद्ध करने का ऋजु अवसर प्रदान करती है। विधि तथा व्यवस्था बनायी रखी जा सकती है, जब न्यायालय अपना कृत्य केवल यह सुनिश्चित करने के लिए ही नहीं सम्पादित करते है कि कोई निर्दोष व्यक्ति दंडित नहीं किया जाए बल्कि इसलिए भी करते हैं कि कोई दोषी व्यक्ति भी न बच पाए। निर्दोष को दोष मुक्त करना तथा दोषी को दण्डित करना, दोनों ही न्यायाधीश के लोक कर्तव्य है।' यदि कोई न्यायाधीश किसी वाद हेतुक का विचारण करता है तब उसमें इतनी क्षमता साहस तथा न्यायिक निष्पक्षता होनी चाहिए कि वह अपने समक्ष मामले को वस्तुनिष्ठता, ऋजुता तथा निष्पक्षता से निपटा सके। कोई भी व्यक्ति न्यायिक हैसीयत में कार्य नहीं कर पाएगा यदि उसका पूर्ण आचरण यह विश्वास करने का आधार प्रदान करता है कि वह इस मामले का निस्तारण में खुले मस्तिष्क अथवा निष्पक्षता से नहीं कर पाएगा। उच्चतम् न्यायालय के आदेशानुसार सुनवाई करने वाले न्यायाधीश को न केवल ऋजुता से सुनवाई करनी चाहिए बल्कि उसका न्यायिक कृत्य अऋजुता (unfairness) तथा द्वेष (bias) के सन्देह से ऊपर हाना चाहिए।
4. भारतीय न्यायिक, आपराधिक तथा विधिक व्यवस्था की कुछ मूल तथा आधारभूत विशिष्टताएं:
(i) साधारण-भारतीय न्यायिक, आपराधिक तथा विधिक व्यवस्था की कुछ अपनी मूल भूत मौलिक तथा विशिष्ट विशेषताएं है। उनका पूर्ण ज्ञान इस व्यवस्था से जुड़े प्रत्येक अंग. न्यायाधीश, अभियोजन शाखा, सफाई पक्ष के अधिवक्ता तथा सामान्य जनता को होना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि आपराधिक विचारणों के प्रत्येक पहलु की व्याख्या तथा निर्धारण इन्हीं आधारभूत विशेषताओं के सन्दर्भ में किया जाना अपेक्षित है।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने नवीनतम् निर्णय हिम्मत सुखदेव वाहे गुरू वनाम महाराष्ट्र राज्या.' में भारी मन से स्वीकार किया है कि वर्तमान में भारत की आपराधिक न्यायिक व्यवस्था कुछ बड़ी कमियों, विशेषकर उन मामलों में जिनमें एक से अधिक अभियुक्त आरोपित होते हैं, ग्रसित है। ये स्पष्ट कमियों है:
(i) पैबन्दयुक्त तथा बेइमानी युक्त (डिसअनास्ट) प्रथम् सूचना
(ii) धीमा, विलम्वकारी तथा मिथ्या दिशादर्शक अन्वेषण तथा
(ii) बिना किसी झिझक तथा शर्म के झूठा साक्ष्य देने वाले गवाह।
उपरोक्त कठिनाइयों के अतिरिक्त अन्य कठिनाइयाँ न्यायाधीश के कर्त्तव्य एवम् दायित्व को कठिन बना रही हैं। ऐसी दोषपूर्ण स्थिति में न्यायाधीश एक तरह से विकलांग्ता की स्थिति में आ गया है और उसे न्याय करने के लिए जीवन के साधारण आचार-विचार, सामान्य माननीय व्यवहार तथा अपने वृहद अनुभव के साथ कानून के ज्ञान के साथ-साथ अपनी छटी इन्द्रि का भी प्रयोग करना पड़ता है।
(ii) आंग्ल विधि वनाम भारतीय विधि-भारतीय आपराधिक तथा विधिक प्रणाली आंग्ल आपराधिक तथा विधिक प्रणाली से प्रभावित अवश्य है। यह उक्त आंग्ल प्रणाली से मार्गदर्शित भी रही है किन्तु जहां भारतीय आपराधिक विधि के अपने अधिनियमित कानूनी विशिष्ट उपबंध है वहां आंग्ल विधि तथा उसकी नजीरें भारतीय आपराधिक उपबंधो की व्याख्या तथा अर्थान्व्ययन के लिए पूर्णतः अप्रसागिक तथा असंगत है किन्तु यदि कोई भारतीय आपराधिक विधि अस्पष्ट है तब कुछ सीमा तक आंग्ल विधि का सहारा लिया जा सकता है।'
(iii) भारतीय पीनल व्यवस्था में राज्य प्रधान अभियोजक है-भारतीय आपराधिक व्यवस्था में कतिपय निजी मामलों को छोड़कर राज्य प्रधान अभियोजक है। 'अपराध सभ्य समाज के प्रति विद्रोह है। यदि किसी व्यक्ति के विरूद्ध भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय 20 (विवाह सम्बंधी अपराध) तथा अध्याय 21 (मानहानि) दण्डनीय अपराधों को छोड़कर कोई साधारण आपराधिक अपराध कारित किया जाता है तब यह अपराध न केवल उस अपराध से सीधे प्रभावित वादी के विरूद्ध है बल्कि यह सम्पूर्ण समाज के विरूद्ध भी है क्योंकि इससे समाज की विधि व्यवस्था प्रभावित होती है तथा लोक परिशान्ति क्षुब्ध होती है। इसी कारण भारतीय दाण्डिक व्यवस्था में आपराधिक मामलों में अभियोजन राज्य की ओर से प्रस्तुत किया जाता है और राज्य प्रधान अभियोजक है।'
उच्चतम् न्यायालय ने विधि निर्णय जाहिरा हबीबुल्ला शेख बनाम गुजरात राज्य में टिप्पणी की है कि राज्य नागरिकों के अधिकारों का रक्षक है। इसी कारण आपराधिक मामलों को पूरी तरह प्राइवेट पक्षकारों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता है। अपराध एक लोक गलती है जो लोक अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रतिलंधन का परिणाम है। इससे सम्पूर्ण समाज प्रभावित होता है।
इसी तरह माननीय उच्चतम् न्यायालय ने विधि निर्णय जापानी साहु वनाम् चन्द्र शेखर मोहिन्ते,' में उक्त प्रकार के ही विचार प्रकट करते हुए अभिनिर्धारित किया है कि यह एक सुस्थापित कानून है कि आपराधिक अपराध राज्य तथा समाज के विरुद्ध गलती माना जाता है हांलाकि यह गलती किसी एक विशिष्ट व्यक्ति के विरुद्ध कारित की जाती है। आमतौर पर गम्भीर अपराधों में अभियोजन राज्य द्वारा शुरू किया जाता है।
5. अन्वेषण ऋजु (फेयर) होना चाहिए अन्वेषण अधिकारी का कर्तव्य मात्र दोषसिद्धि प्राप्त करना नहीं:
आपराधिक केस का अन्वेषण ऋजु (फेयर) होना चाहिए और इसे सभी आपत्तिजनक विशिष्टियों अथवा कमियों से स्वतन्त्र होना चाहिए। इसे किसी पक्ष से दुर्भावना युक्त हेतुक नहीं होना चाहिए।
अन्वेषण अधिकारी को दोनों पक्षकारों के हितों को दृष्टिगत रखना है। अन्वेषण अधिकारी का कर्तव्य मात्र अभियोजन के केस को बढ़ा चढ़ा कर दोषसिद्धि प्राप्त करना नहीं है।' आपराधिक अपराध राज्य तथा समाज के विरूद्ध गलती माना जाती है यद्यपि यह एक व्यक्ति विशेष के विरुद्ध कारित किया जाता है। साधारणतः गंभीर अपराधों में अभियोजन राज्य द्वारा ही प्रारम्भ किया जाता है। विधि न्यायालय को ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि वह मात्र देरी के आधार पर किसी अभियोजन को समाप्त कर सके। विधि के न्यायालय को सम्पर्क करने में मात्र देरी किसी भी केस को निरस्त करने का आधार नहीं है। यद्यपि यह अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए सुसंगत विचार हो सकता है।
शीघ्रतः विचारण की गारंटी शोषण तथा देरी से बचने के लिए आशियत है और यह न्यायालय तथा अभियोजन पर दायित्व अधिरोपित करती है कि विचारण युक्ति युक्त अवधि में समाप्त किया जाए। ऐसी गारन्टी तीन प्रकार के प्रयोजनों को पूरा करती है। प्रथमतः अभियुक्त की पूर्व विधारण कारावास में संरक्षण प्रदान करती है द्धितीयतः यह अभियुक्त को उस चिन्ता (Anxiety) तथा लोक सन्देह से मुक्ति दिलाती है जो आपराधिक आरोप लगने से उत्पन्न होती है तथा अतिमतः यह उस जोखिम से सरक्षण प्रदान करती है जो देरी के कारण गवाहों की स्मरण शक्ति से गुम हो सकता है। यह भी सम्भव है कि देरी से अभियुक्त को अपनी प्रतिरक्षा करने की क्षमता ही समाप्त हो जाए।'
किसी अपराध के अभियुक्त के संबंध में शीघ्रतः विचारण तथा ऋजु (फेयर) विचारण संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंश है: किंतु दोनों अधिकारों में गुणावत्ता संबंधी (Qualitative) अंतर है। अभियुक्त के ऋजु विचारण के अधिकार के विपरीत (unlike) शीघ्रतः विचारण के बंचित किए जाने से से अभि अभियुक्त स्वतः अपनी प्रतिरक्षा में प्री जुडिस (Prejudice) नहीं है। शीघ्रतः विचारण का अधिकार प्रकृति में साक्षेपिक (रिलेटिव) है। यह अधिकार विभिन्न परिस्थितियों पर निर्भर करता है। प्रत्येक देरी शीघ्रतः विचारण के अधिकार को प्रभावित नहीं करती है। शीघ्रत विचारण के भाव पर विचारण करते समय हमें अपराध के समाज पर प्रभाव तथा जनता की न्यायिक प्रणाली में विश्वास बने रहने को भी देखना है। सार के रूप में शीघ्रतः विचारण के वंचित होने के अधिकार की आशंका से अभियोजन को जारी न रखने अथवा आपराधिक अभियोजनों को खारिज करना नहीं है। शीघ्रतः विचारण संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन गारन्टी कृत अधिकार जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है' अनुच्छेद 21 यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी नागरिक को उसके जीवन से बिना विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को अपनाएं वंचित नहीं किया जा सकता है। फिर ऐसी प्रक्रिया ऋजु (फेयर) तथा शीघ्रतः होनी चाहिए। सन्देह कितना भी गहरा क्यों न हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता है। दोष सिद्ध तथा दंडित करने वाले न्यायालय को हो सकता है "May be" होना चाहिए must be के बीच दूरी को एक तार्किक स्पष्ट तथा आलोचनाहीन योग्य साक्ष्य से तय करना होगा।
6. सी.बी.आई. द्वारा अन्वेषण कब सम्भव :
जब राज्य पुलिस द्वारा अन्वेषण अनेक पुलिस अधिकारियों के अपराध में लिप्त रहने के कारण समुचित रूप से सम्पादित नहीं हुआ है तब अन्वेषण को सी.बी.आई. द्वारा कराया जाना चाहिए। आरोप पत्र आने के बाद भी सी बी.आई. द्वारा कराने के आदशे दिए जा सकते हैं।' सी बी आई. द्वारा अन्वेषण करने का आदेश केवल अपवादी मामलों में ही किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय स्थानीय पुलिस के स्थान पर सी.बी.आई. द्वारा अन्वेषण का आदेश दे सकता है |
सी बी आई द्वारा अन्वेषण का अधिकार जो केवल संवैधानिक न्यायालय को है, यदा- कदा, सचेतता से केवल अपवादी परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
न्यायालय द्वारा यदि सी. बी. आई. के अन्वेषण की मौनीटियरिंग कर रही है तब रोपी मौनीटियरिंग विचारण न्यायालय में आरोप पत्र पाने के बाद समाप्त हो जाती है। विचारण न्यायालय रो से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 173, (धारा 154 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन यदि सूचना से संज्ञेय अपराध का केस गठित होता है। पुलिस के लिए केस पंजीकृत करना आज्ञापक है। यदि किसी सूचना से संज्ञेय अपराध का केस बनता है तब पुलिस अधिकारी के समक्ष एफ. आई. आर पंजीकृत करने के अतिरिक्त विकल्प नहीं है। पुलिस प्रारम्भिक जाँच केवल यह सुनिश्चित करने के लिए कर सकती है कि क्या दी गयी सूचना से संज्ञेय अपराध का गठन होता है। पुलिस प्रारम्भिक जाँच यह सुनिश्चित करने के लिए नहीं कर सकती है कि क्या दी गयी सूचना विश्वसनीय है या नहीं।
7. अन्वेषण की अनियमितता तथा अवैधता का प्रभाव विचारण पर नहीं, केसेस न्यायालय तय करेगा अन्वेषण अधिकारी नहीं:
यह पूर्णतः सुस्थापित है कि यदि अन्वेषण विधि विरुद्ध है या सन्दिग्ध है, तब भी साक्ष्य की सवीक्षा उक्त दोषों से स्वतन्त्र करके की जानी चाहिए अन्यथा आपराधिक विचारण अन्वेषण अधिकारी के कब्जे में आ जाएगा। न्यायालयों को अन्वेषण अधिकारी के अन्वेषण से साक्ष्य को अधिक प्राथमिकता देनी चाहिए। आपराधिक न्याय को अन्वेषणधिकारी की कमियों का दास नहीं होना चाहिए। दूसरे शब्दों में यदि न्यायालय किसी गवाह के साक्ष्य से सन्तुष्ट है तब न्यायालय ऐसे गवाह के साक्ष्य को अन्वेषण अधिकारी के सन्देह युक्त आचारण के बाद भी स्वीकार कर सकता है।
अन्वेषण एजेन्सी की ओर से कारित अन्वेषण में लोप तथा कमियों स्वतः अभियोजन के केस को अस्वीकृत करने के लिए न्यायोचित आधार नहीं है।
यह सही है कि पुलिस को सज्ञेय अपराध के अन्वेषण सम्बंधी शक्तियाँ असीमित है।किन्तु उनका प्रयोग भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की परिचि में ही किया जा सकता है। उसके बाहर जाकर पुलिस द्वारा व्यक्ति के व्यक्तिगत अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं होगा।'
मात्र यह तथ्य कि अन्वेषण में कुछ कमियों हैं और अन्वेषण अधिकारी ने कुछ गलतिया की है. यह दोष मुक्ति का आधार नहीं हो सकता है।
अन्वेषण के दौरान कारित कमियों या गलतियों से दोष मुक्ति नहीं होगी जब अभियोजन केस का सार या केन्द्र विन्दु पत्रावली पर स्थापित हो गया है।" अन्वेषण अधिकारी को पुलिस मैनुअल में निहित निर्देशों का अनुपालन करना चाहिए। ऐसा अधिकारी परिश्रमी, सत्यवादी तथा अपनी पहुंच में निष्पक्ष होने के लिए विधि रूप से आबद्ध है। दोष पूर्ण अन्वेषण के केस में न्यायालय का कर्त्तव्य है कि यह बहुत ही गहनता से सतर्क तथा सावधान रहे और यह सुनिश्चित करें कि सत्य निर्धारण प्रक्रिया ऐसे दोषों से प्रतिकूल रूप से प्रभावित (Subserved) न हो।
शरारती तथा झूठे अन्वेषण (Shoddy) के लिए सरकार को अन्वेषण अधिकारी के विरूद्ध कार्यवाही के लिए लिखा जा सकता है।
दोषपूर्ण अन्वेषण का तथ्य जब तक यह अभियुक्त की दोषिता पर युक्तियुक्ति सन्देह उत्पन्न नहीं करता है. अभियाजन के केस को तिरस्कृत करने के लिए काई आधार नहीं हो सकता है।
अन्वेषण में आए दोष अभियोजन के लिए घातक नहीं है जब तक ऐसे दोष इतने गम्भीर न हो जिससे सम्पूर्ण अभियोजन को बेइमानी अथवा अभियुक्त से मार्ग दर्शित (guided investigation) करार नहीं किया।'
अन्वेषण अधिकारी का एक मात्र कर्तव्य अभियोजन के पक्ष में ऐसा साक्ष्य ही एकत्रित करना नहीं है जो न्यायालय को दोषसिद्धि का आदेश पारित करने में समर्थ कर सके बल्कि उसका कर्त्तव्य न्यायालय के समक्ष घटना का सत्य वृर्तान्त बिला किसी रंगत के प्रस्तुत करना है। अन्वेषण शाखा का नैतिक आचरण अत्यन्त रूप से अनिवार्य है अतः अन्वेषण के विरूद्ध दुर्भावना अथवा द्वेष के भाव का कोई स्थान नहीं है संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन अन्वेषण शाखा के प्रत्येक निर्दोष व्यक्ति की व्यक्तिगत् स्वतंत्रता का संरक्षक है अतः अभियोजन शाखा का कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कोई भी निर्दोष व्यक्ति पीड़ित न हो और उसे तंग न किया जाए किंतु साथ ही साथ अन्वेषण शाखा को अभियुक्त असम्यक छूट अथवा लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। प्रत्येक अन्वेषण को निष्पक्ष, ऋजु बाहरी प्रभाव से स्वतंत्र होना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्वेषण न्यायिक, पारदर्शी, स्वतंत्र, शीघ्रतः तथा संविधान के अनुच्छेद 19, 20 तथा 21 के उपवधाधीन अपेक्षित विधि के प्रशासन को सुनिश्चित करने वाला होना चाहिए।
