अभियोजन पर यह भार है कि अभियुक्त ने अपराध किया है। अभियुक्त पर यह साबित करने का भार नहीं कि उसने अपराध नहीं किया है:


अभियोजन पर यह भार है कि अभियुक्त ने अपराध किया है। अभियुक्त पर यह साबित करने का भार नहीं कि उसने अपराध नहीं किया है:

(अ) अभियोजन अपराध के प्रत्येक संघटक को सिद्ध करने के लिए बाध्य चाहे अपराध के सम्बंध में कोई कानूनी उपधारणा भी है-   भारतीय दण्ड व्यवस्था में इस विधिक बिन्दु पर कभी कोई विवाद नहीं रहा है कि अभियुक्त का दोष सिद्ध करने का सम्पूर्ण भार अभियोजन पर है। अभियुक्त के पक्ष में तो निर्दोषता की उपधारणा है। इस विधिक स्थिति को निम्नवत् स्पष्ट किया जा सकता है। आरोपित अपराध तथा आरोप के प्रत्येक संघटक (इनग्रीडियन्ट) को स्थापित करने का भार सदैवतः अभियोजन पर है।'

        अभियोजन को अपना केस स्वयं अपने आप से स्थापित करना है। अभियोजन अपना केस सिद्ध करने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 119, (धारा 114 साक्ष्य अधिनियम) का लाभ नहीं ले सकता है।"

अभियोजन को अपना केस अपने आप सिद्ध करना है। वह अभियुक्त पर केस सिद्ध करने के भार को बदल नहीं सकता है।

    यदि मामला उपधारणा से गठित होने वाले अपराध जैसे भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 80. (धारा 304 ख भारतीय दण्ड सहिता) का भी है तव उपधारणा का लाभ लेने से पहले अभियोजन को अपराध के सघटक सिद्ध करने होंगे।'

(ब) सन्देह कितना भी घोर क्यों न हो वह प्रामण का स्थान नहीं ले सकता है। अभियोजन को अपने केस के बारे में केवल यह सिद्ध करना पर्याप्त नहीं है कि उसका कैस सच हो सकता है। उसे तो यह सिद्ध करना होगा कि उसका केस सच ही होना बाहिए।


(स) अभियोजन को अपने पैरों पर खड़ा होना है। वह सफाई के केस की गलतियों का लाभ नहीं उठा सकता है- यदि अभियुक्त अलीबी की प्ली को सिद्ध नहीं कर पाता है तब यह उसके विरुद्ध यह एक परिस्थिति तो है किन्तु अभियोजन इसका लाभ तभी ले पाएगा जब वह अपना केस अपने साक्षय से अन्य परिस्थितियों में स्थापित कर देता है।

(द) अभियुक्त सफाई देने के लिए कानूनी रूप से आबद्ध नहीं है- अभियोजन को अपना कैस युक्ति युक्त सन्देह की छाया से परे सिद्ध करना है। अभियुक्त सफाई देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। वह चुप रह सकता है।

1. भारतीय आपराधिक प्रणाली में कहावत एक बात में झूठा तब सब में झूठा (falsus in uno falsus in omnibus) लागू नहीं:

    लेटिन की यह कानूनी कहावत कि यदि कोई गवाह या उसका ब्यान एक बात में झूठा है तब उसे या उसके ब्यान को सब में झूठा माना जाएगा, भारत में दाण्डिक विचारणों पर लागू नहीं होती। माननीय उत्च्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के आधार पर इस कहावत के सम्बंध में विधिक स्थिति निम्नवत है।

1 यह एक खतरनाक कहावत है, विशेषकर भारतीय परिस्थितियों में।

2 यह एक ठोस तथा युक्ति युक्त साक्ष्य का नियम नहीं है।

3. भारतीय गवाह कुछ तथ्यों पर सत्य बोलता है. कुछ तथ्यों पर असत्य।

भारतीय गवाह कुछ अभियुक्तों के विरूद्ध सही गवाही देता है, किन्तु कुछ सहअपराधियों के विरूद्ध उन्हें अपराध में फसाने वाली झूठी गवाही देने से भी नहीं हिचकता है।


5. भारतीय गवाह बात को बढ़ा चढ़ाकर अपनी रंगत देकर पेश करने की प्रवृति रखता है।


6. कभी-कभी ऐसा गवाह सत्य और असत्य को ऐसा मिला देता है कि उन्हें अलग करना सम्भव नहीं होता।

        अतः उक्त कहावत के सम्बंध में विद्धान न्यायाधीशों से अपेक्षा की गई है कि वह इस कहायत की सवीक्षा प्रत्येक मामले के तथ्यों व परिस्थितियां के आधार पर करें। सत्य को असत्य से उसी प्रकार अलग करे जैसे अनाज को भूसे से अलग किया जाता है तथा यह सुनिश्चित करे कि क्या ऐसे पृथक करने में उसके समक्ष तथ्यों की सत्यता अथवा असत्यता के सम्बंध में सही स्थिति आ गयी है। क्या पृथक किए गए साक्ष्य पर विश्वास किया जा सकता है और क्या इस पृथक किए गए साक्ष्य के आधार अभिलेख पर उपलब्ध अन्य साक्ष्य के सन्दर्भ में अभियुक्त का दोष सिद्ध किया जा सकता है। विद्धान न्यायाधीश को ऐसे गवाह के साक्ष्य की सवीक्षा करते समय यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ऐसा तो नहीं है कि सत्य और असत्य इतना मिल गया है और एक दूसरे में समा गया है कि उन्हें पृथक नहीं किया जा सकता है। ऐसे साक्ष्य के सम्बंध में प्रज्ञा का नियम यह होना चाहिए कि ऐसे साक्ष्य को अस्वीकृत कर दिया जाए।'

        यदि साक्ष्य में कुछ कमी भी पायी जाती है और यह पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है तब्ब भी न्यायालय अनाज को भूसे से अलग करने की प्रक्रिया अपना कर अभियुक्त को दोष सिद्ध कर सकता है चूंकि भारत में एक बात में झूठा तो सब बातों में झूठा की कहावत लागू नहीं होती।

2. भारतीय दाण्डिक व्यवस्था में अभियोजन और सफाई पक्ष के साक्ष्य की संदीक्षा के स्टैन्डर्ड में अंतर रखा गया है:

भारतीय दाण्डिक न्याय डिलीवरी प्रणाली जो आंग्ल आपराधिक विधि पर मुख्यतः आधारित है, का प्रारम्भ से वर्तमान तक एक मात्र मार्गदर्शक सूत्र यह रहा है कि अपना केस सिद्ध करने का भार सदैव से विचारण से अपील की स्टेज तक युक्तियुक्त सन्देह से परे अभियोजन पर रहा है। यह भार स्थायी है। इसमें परिवर्तन परमीसेबिल नहीं है। किन्तु जहा तक सफाई पक्ष पर अभियुक्त की निर्दोषता को सिद्ध करने के भार का प्रश्न है वह अभियुक्त पर कभी भी नहीं रहा है। अभियुक्त यदि अपनी सफाई में कोई प्ली लेता है तब उस पर यह भार नहीं है कि वह उसे सन्देह से परे सिद्ध करे। उसके लिए इतना प्रतिपादित करना पर्याप्त है कि ऐसे होने की भी सम्भावना है। उसे किसी तथ्य को प्रमाणित नहीं करना है। उसके लिए उसे अभियोजन के केस में मात्र सन्देह उत्पन्न करना है और अपने कंस के सन्दर्भ में मात्र सही होने की सम्भावना। इसके अतिरिक्त यदि अभियोजन के केस अथवा साक्ष्य से अभियुक्त को कोई लाभ मिल सकता है तो उसे वह प्राप्त करने का हकदार है और इस आधार पर वह दोष मुक्ति का निष्कर्ष पा सकता है।'

    अभियुक्त को अपना साक्ष्य सफाई के रूप में अन्तिम जड़ तक नहीं सिद्ध करना है।

3. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175. (धारा 156 (3) दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन नजीरें-

        यदि मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 223. (धारा 200 दण्ड प्रक्रिया संहिता) परिवाद पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 210. (बारा 190(1) (क) दण्ड प्रक्रिया संहिता) के उपबंधाधीन अपराध की सज्ञान ले ली है। ऐसी सज्ञान लेने के बाद मजिस्ट्रेट भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175. (धारा 156 (3) दण्ड प्रक्रिया संहिता) के उपबंधाधीन अन्वेषण का आदेश नहीं कर सकता है।

        यह मजिस्ट्रेट का विवेकाधिकार है कि वह किसी परिवाद पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 210. (घारा 190 (1) (क) दण्ड प्रक्रिया संहिता) के उपबंधाधीन अपराध की संज्ञान ले और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 223, (घारा 200 दण्ड प्रक्रिया संहिता) आदि उपबंधों का अनुपालन करे अथवा वह इसको भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175. (धारा 156 (3) दण्ड प्रक्रिया संहिता) को उपबंधाधीन बिला संज्ञान लिए पुलिस को अन्वेषण हेतु भेज दे। मजिस्ट्रेट के विवेकाधिकार में वरिष्ठ न्यायालय केवल इस आधार पर हस्तक्षेप नहीं करेगा क्योंकि अन्य विकल्प भी सम्भव था।'

    अन्वेषण के दोष अभियोजन के लिए तब तक घातक नहीं है जब तक ऐसे दोष इतने धोर नहीं है जो सम्पूर्ण अन्वेषण को बेईमानी से या एक तरह का सीखा सिखाया चित्रित करें।

    क्या मजिस्ट्रेट भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175, (धारा 156 (3) दण्ड प्रक्रिया संहिता) के उपवधाधीन अन्वेषण की मौनीटीरिंग कर सकता है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार यदि अन्वेषण स्थानीय पुलिस द्वारा उचित रूप से नहीं कर रही है तब मजिस्ट्रेटे अन्वेषण की मौनीटरिंग कर सकता है।'

4. एफ.आई आर. की नकल को मजिस्ट्रेट को देरी से भेजने का प्रभाव-

    मजिस्ट्रेट को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 176, (धारा 157(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता) की अपेक्षानुसार एफ. आई. आर. की नकल न भेजने से अभियोजन के केस पर गम्भीर सन्दहे उत्पन्न करेंगे।

    भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 176. (धारा 157 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के उपबंधाधीन मजिस्ट्रेट को एफ आई आर की नकल भेजने में देरी यदि सामान्य है और इसे स्पष्ट कर दिया गया है तब यह देरी अभियोजन के लिए घातक नहीं होगी।"

     भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 176, (धारा 157 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन मजिस्ट्रेट को एफ.आई.आर की नकल भेजने में प्रत्येक देरी अभियोजन के लिएा घातक नहीं। अभियुक्त को यह दर्शित करना होगा कि उस पर ऐसी देरी से क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।'

        जब विवेचनाधिकारी घटना के बाद देरी से घटना स्थल पर शाम को गया था किन्तु उसने अगले दिन सुबह घटना स्थल का मानचित्र बनाया था तब विवेचनाधिकारी द्वारा देरी से घटना का मानचित्र बनाना और एफ आई आर. की नकल भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 176. (धारा 157 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन मजिस्ट्रेट के कार्यालय को देरी से भेजने से एफ.आई.आर. एंटी टाइम नहीं हो जाएगी।

        जब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 176, (धारा 157 दण्ड प्रक्रिया संहिता) की आदेशानुसार मजिस्ट्रेट के कार्यालय भेजने में कोई असम्यक देरी नहीं है और जो सम्यक देरी हुई है. उसे स्पष्ट कर दिया गया है तब अभियुक्त के विचारण पर कोई प्रतिकलू प्रभाव नहीं पड़ेगा।"

        संबंधित क्षेत्राधिकारिता के न्यायालय को एफ आई आर. की नकल भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 176, (धारा 157 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन भेजने में मात्र देरी अभियोजन के सपूर्ण केस को तिरस्कृत करने के लिए काफी नहीं है। प्रस्तुत मामले में एफ.आई.आर. भेजने में तीन दिन की देरी अभियोजन के लिए घातक नहीं मानी गयी। मात्र देरी हुई इस आधार पर एफ आई आर को बनावटी तथा एन्टीडेट मानना गलत होगा।

        यद्यपि मजिस्ट्रेट को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 176, (धारा 157 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन एफ. आई आर की नकल देरी से भेजी गयी है तब भी यह तथ्य स्वतः अभियोजन के लिए घातक नहीं होगा जब तक इससे अभियुका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना दर्शित नहीं है।'


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