सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 38 होगी: लोकसभा ने पारित किया महत्वपूर्ण विधेयक

सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 38 होगी: लोकसभा ने पारित किया महत्वपूर्ण विधेयक

सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या वृद्धि: न्यायिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम

भारत की न्यायपालिका लोकतंत्र का एक स्तंभ है। सुप्रीम कोर्ट इस व्यवस्था का शीर्ष संस्थान है, जो संविधान की रक्षा करता है और नागरिकों को अंतिम न्याय प्रदान करता है। पिछले कई वर्षों से इस सर्वोच्च न्यायालय पर लंबित मामलों का भारी बोझ बना हुआ है। 3 अगस्त 2026 को लोकसभा ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पारित कर इस समस्या के समाधान की दिशा में एक ठोस प्रयास किया। इस विधेयक के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या मुख्य न्यायाधीश सहित 34 से बढ़ाकर 38 कर दी गई है। यह निर्णय न केवल संख्यात्मक वृद्धि है, बल्कि न्याय की गुणवत्ता और गति दोनों को बेहतर बनाने का प्रयास भी है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट की संरचना का प्रावधान है। प्रारंभ में न्यायाधीशों की संख्या सीमित थी, लेकिन देश की बढ़ती आबादी, आर्थिक विकास, सामाजिक जागरूकता और मुकदमों की बढ़ती संख्या के कारण समय-समय पर इसमें वृद्धि की गई। 2019 में अंतिम बार संख्या बढ़ाकर 34 की गई थी। उसके बाद से मामलों की संख्या में निरंतर वृद्धि हुई है। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में लगभग 95,000 मामले लंबित हैं। इनमें से कई मामले एक दशक से अधिक पुराने हैं। कुछ मामले तो 20 से 30 वर्ष से भी अधिक समय से अटके हुए हैं।

मामलों के पंजीकरण और निपटान के बीच का अंतर लगातार बना हुआ है। विशेष रूप से संवैधानिक महत्व के मामले, जिन्हें पाँच, सात या नौ न्यायाधीशों की बेंच की आवश्यकता होती है, लंबे समय तक लंबित रहते हैं। पर्याप्त न्यायाधीशों की अनुपलब्धता के कारण मुख्य न्यायाधीश नियमित रूप से बड़ी बेंच गठित नहीं कर पाते। यह स्थिति न केवल न्याय में देरी पैदा करती है, बल्कि आम नागरिकों के विश्वास को भी प्रभावित करती है।

मई 2026 में केंद्र सरकार ने इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए अध्यादेश जारी किया था। उस अध्यादेश के आधार पर संख्या अस्थायी रूप से बढ़ाई गई और कुछ नए न्यायाधीशों की नियुक्ति भी हुई। अब संसद ने स्थायी कानून बनाकर इस व्यवस्था को सुदृढ़ किया है।

विधेयक के मुख्य प्रावधान

विधेयक का उद्देश्य Supreme Court (Number of Judges) Act, 1956 में संशोधन करना है। इसमें मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 की गई है। इस प्रकार कुल संख्या मुख्य न्यायाधीश सहित 38 हो जाएगी। विधेयक को 16 मई 2026 से प्रभावी माना गया है, ताकि अध्यादेश के तहत की गई नियुक्तियाँ और कार्रवाई वैध बनी रहें।

यह वृद्धि केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य न्यायालय की कार्यकुशलता बढ़ाना, मामलों के निपटान की दर में सुधार करना और संवैधानिक मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता देना है। सरकार का स्पष्ट मत है कि अतिरिक्त न्यायाधीशों की उपलब्धता से दैनिक बेंचों की संख्या बढ़ेगी और मामलों का निपटान तेज होगा।

संसद में पारित होने की प्रक्रिया

3 अगस्त 2026 को लोकसभा की कार्यवाही हंगामे भरी रही। विपक्षी सदस्यों ने NEET पेपर लीक और अन्य मुद्दों पर नारेबाजी की। सदन दो बार स्थगित हुआ। दोपहर के सत्र में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक पेश किया। उन्होंने संक्षिप्त परिचय दिया और चर्चा का आह्वान किया। किंतु लगातार व्यवधान के कारण चर्चा संभव नहीं हो सकी। अध्यादेश को निरस्त करने संबंधी विपक्ष का प्रस्ताव ध्वनिमत से अस्वीकृत हुआ और उसके बाद विधेयक भी ध्वनिमत से पारित हो गया। विधेयक पारित होने के पश्चात सदन दिन भर के लिए स्थगित कर दिया गया।

यह प्रक्रिया दर्शाती है कि न्यायपालिका से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी राजनीतिक मतभेद हावी हो सकते हैं। फिर भी सरकार ने इस गैर-राजनीतिक विषय को आगे बढ़ाया, जो सराहनीय है। अब विधेयक राज्यसभा में जाएगा। दोनों सदनों से पारित होने और राष्ट्रपति की अनुमति के बाद यह कानून बन जाएगा।

अपेक्षित लाभ और प्रभाव

संख्या वृद्धि से कई स्तरों पर लाभ होने की संभावना है। सबसे पहले, लंबित मामलों में कमी आएगी। अधिक न्यायाधीश उपलब्ध होने से प्रतिदिन अधिक बेंच कार्य कर सकेंगी। दूसरे, संविधानिक बेंच नियमित रूप से गठित हो सकेंगी। वर्तमान में सैकड़ों मामले बड़ी बेंच की प्रतीक्षा में हैं। तीसरे, न्यायाधीशों पर काम का दबाव कम होगा, जिससे निर्णयों की गुणवत्ता में सुधार संभव है।

यह कदम न्यायपालिका की स्वतंत्रता और दक्षता दोनों को मजबूत करेगा। पिछले वर्षों में कई मुख्य न्यायाधीशों और कानूनी विशेषज्ञों ने न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की मांग की थी। सरकार ने इस मांग को स्वीकार कर एक सकारात्मक संदेश दिया है। इससे आम नागरिकों में यह विश्वास बढ़ेगा कि न्याय व्यवस्था उनकी समस्याओं के प्रति संवेदनशील है।

चुनौतियाँ और आगे की राह

संख्या बढ़ाने मात्र से समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती नए न्यायाधीशों की समय पर नियुक्ति है। कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से नामों की सिफारिश और सरकार द्वारा स्वीकृति की प्रक्रिया में कभी-कभी विलंब होता है। यदि पद लंबे समय तक रिक्त रहे तो अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाएगा।

दूसरी चुनौती बुनियादी ढाँचे की है। अतिरिक्त न्यायाधीशों के लिए कोर्ट रूम, स्टाफ, तकनीकी सुविधाएँ और अन्य संसाधनों की आवश्यकता होगी। बजट पर भी प्रभाव पड़ेगा। तीसरी चुनौती मामलों की प्रकृति में बदलाव की है। कई मामले जटिल संवैधानिक और कानूनी प्रश्नों से जुड़े होते हैं, जिनके लिए गहन अध्ययन और समय की आवश्यकता होती है।

इन चुनौतियों के बावजूद यह कदम सही दिशा में है। भविष्य में आवश्यकतानुसार संख्या में और वृद्धि की जा सकती है। साथ ही, वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र, मध्यस्थता और डिजिटल न्याय व्यवस्था को भी मजबूत करने की जरूरत है, ताकि अदालतों पर बोझ कम हो।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या 38 करने का निर्णय भारत की न्याय व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह न केवल लंबित मामलों की समस्या से निपटने का प्रयास है, बल्कि न्याय की सुलभता और गति को बढ़ाने का भी संकेत है। लोकसभा ने हंगामे के बावजूद इस विधेयक को पारित कर दिखाया कि न्यायपालिका की मजबूती किसी भी राजनीतिक मतभेद से ऊपर है। अब राज्यसभा और राष्ट्रपति की अनुमति के बाद यह कानून लागू होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह कदम सुप्रीम कोर्ट को और अधिक प्रभावी बनाएगा तथा आम नागरिकों को समय पर न्याय दिलाने में सहायक सिद्ध होगा। न्याय व्यवस्था की मजबूती ही लोकतंत्र की असली मजबूती है।


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